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धर्म संसार

इस एकादशी को ​तिल दान से मिलता है बड़ा पुण्य

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मालीराम वर्मा

माघ महीने के कृष्णपक्ष की एकादशी को षट्तिला एकादशी अथवा तिलकूटा एकादशी (Tila Kuta Ekadashi) कहा जाता है। इस दिन तिल दान का विशेष महत्त्व है। कहा जाता है कि इस दिन जितने तिल दान किए जाते है उतने ही हजार दिन स्वर्ग में मिलते है। इस दिन तिल का इस्तेमाल स्नान, प्रसाद, भोजन, दान, तर्पण आदि सभी चीजों में किया जाता है। तिल के कई प्रकार के उपयोग के कारण ही इस दिन को षटतिला एकादशी (Shattila Ekadashi) कहते हैं।

षटतिला एकादशी व्रत विधि (Shattila Ekadashi Vrat Vidhi in Hindi)

माघ माह के कृष्ण पक्ष की दशमी को भगवान विष्णु का स्मरण करते हुए गोबर में तिल मिलाकर 108 उपले बनाने चाहिए। इसके बाद दशमी के दिन मात्र एक समय भोजन करना चाहिए। एकादशी के दिन चन्दन, अरगजा, कपूर, नैवेद्य आदि से भगवान विष्णु का कुम्हड़ा, नारियल अथवा बिजौर के फल से विधि विधान से पूजा कर अर्घ्य देना चाहिए। एकादशी के रात्रि को 108 बार “ऊं नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र से उपलों को हवन में स्वाहा करना चाहिए।
इसके बाद ब्राह्मण की पूजा कर उसे घड़ा, छाता, जूता, तिल से भरा बर्तन व वस्त्र दान देना चाहिए। तिल से स्नान, उबटन, होम, तिल का दान, तिल को भोजन व पानी में मिलाकर ग्रहण करना चाहिए।

षटतिला एकादशी की व्रत कथा (Shattila Ekadashi Vrat Katha in Hindi)

एक गांव में एक ब्राह्मणी रहती थी। वह बहुत धर्म परायण थी। भगवान विष्णु के​ निमित्त सभी व्रत उपवास करती थी। एक बार उसने पूरे महीने का व्रत रखा। भगवान विष्णु उसकी भक्ति से प्रभावित थे। एक दिन उन्होंने सोचा कि ब्राह्मणी अन्न दान नहीं करती है। ऐसे में मृत्यु के बाद जब वह वैकुण्ठ में आएगी तो इसकी तृप्ति नहीं हो सकेगी। इसलिए उन्होंने साधु का वेश धरा और ब्राह्मणी के घर भिक्षा मांगने पहुंचे। ब्राह्मणी ने उनका उपहास करते हुए मिट्टी का पिण्ड भगवान के हाथ में रख दिया। भगवान वैकुण्ठ​ धाम लौट आए। कुछ समय बाद ब्राह्मण महिला ने देह त्याग दी। कर्म और भगवान विष्णु की भक्ति के कारण उसे वैकुण्ठ में एक कुटिया मिली लेकिन, उसमें भोजन आदि की व्यवस्था नहीं थी। ब्राह्मण महिला भगवान विष्णु के पास जाती है। भगवान ने उससे कहा कि तूमने पृथ्वीलोक पर रहते हुए कभी अन्न आदि का दान नहीं किया। इसलिए यहां अन्न से वंचित किया गया है। ब्राह्मण महिला रोने लगी। भगवान को उस पर दया आ गई। भगवान विष्णु ने उसे षटतिला एकादशी का व्रत करने और इस दिन तिल, अन्न इत्यादि का दान करने को कहा। ब्राह्मणी ने वैसा ही किया। व्रत और दान के फलस्वरूप उसे कभी भोजन की कमी नहीं आई।

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बीकानेर के करणी माता मंदिर को कहते है चूहों का मंदिर, नवरात्रों में लगता है मेला

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यहां 20 हजार से ज्यादा चूहे है।

करणी माता मंदिर राजस्थान के बीकानेर जिले के देशनोक में है। नवरात्र में यहां ​मेला आयोजित होता है। विश्व में यह एक अनूठा मंदिर है जहां चूहों की पूजा होती है। यहां 20 हजार से ज्यादा चूहे है।

चूहे भगवान गणेश के वाहन है। लेकिन राजस्थान के इस प्रसिद्ध मंदिर में में चूहे देवी करणी के पुत्रों के रुप में पूजते है। करणी माता को देवी दुर्गा का अवतार माना जाता है। चारण समेत कई जातियों की यह कुलदेवी है। आसोज और चैत्र नवरात्रों में यहां मेला आयोजित होता है। इसमें राजस्थान और आसपास के राज्यों से माता के भक्त आते है। करणी माता का मंदिर बीकानेर से करीब 30 किमी दूर देशनोक में स्थित है। यहां करणी माता के दो मंदिर है।

एक मंदिर देशनोक में है और दूसरा वहां से करीब 1 किमी. पर स्थित है। दोनों ही मंदिरों की मान्यता है, लेकिन चूहों का जमघट केवल देशनोक स्थित मंदिर में नजर आता हैं। यहां स्थित यह है कि कब चूहा आपके पैर पर से गुजर जाए अंदाजा नहीं लगा सकते। इसलिए यहां बड़ी सावधानी से चलना पड़ता है। पैर के नीचे चूहे का आना अशुभ माना जाता है।

करणी माता की आरती

करणी माता मंदिर में सुबह और शाम को आरती के वक्त देखने लायक दृश्य होता है। घंटे-घडियाल की आवाज सुनकर चूहे बाहर निकल आते है। कई चूहे आपको यहां झूमते भी नजर आ जाएंगे। वैसे दिनभर इनकी यहां धमाचौकड़ी जारी रहती है। यहां पर कुछ सफेद चूहे भी है जिनका दिखाई देना बहुत शुभ माना जाता है। यहां चूहों को काबा कहते है। चूहों का झूठा प्रसाद खाया भी जाता है। आश्चर्य की बात है कि यहां इतने चूहे हैं लेकिन कभी कोई बीमारी नहीं फैली। करणी माता के भक्त इसे मां का चमत्कार मानते है। चूहों का यहां दूध पिलाया जाता है। उनके प्रसाद के लिए चांदी की परात रखी हुई है।

बीकानेर और जोधपुर राज्य की स्थापना

श्रद्धालुओं का मानना है कि करणी देवी साक्षात मां जगदम्बा की अवतार थीं। जिस स्थान पर मंदिर है वहां लगभग साढ़े छह सौ वर्ष एक गुफा में करणी अपने इष्ट देव की पूजा करती थी। यह गुफा आज भी मंदिर परिसर में स्थित है। करणी माता के ज्योर्तिलीन होने पर उनकी इच्छानुसार उनकी मूर्ति की स्थापना यहां की गई। करणी माता के आशीर्वाद से ही बीकानेर और जोधपुर राज्य की स्थापना हुई थी।

करणी माता का मंदिर देशनोक रेलवे स्टेशन से चंद कदम की दूरी पर स्थित है। देशनोक स्टेशन जयपुर-बीकानेर लाइन पर स्थित है और यह स्टेशन कई शहरों से जुड़ा हुआ है। यहां बस स्टैंड भी है। इसके अतिरिक्त निजी साधन भी बीकानेर के लिए आसानी से उपलब्ध हो जाते है। देशनोक में धर्मशालाएं और होटल भी है। अपने बजट के हिसाब से इनमें आप रूम ले सकते है।

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NEWS

सबरीमाला मंदिर में महिलाओं की एंट्री पर ‘सुप्रीम’ फैसला, 800 साल पुरानी प्रथा खत्म

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केरल के प्रसिद्ध सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा फैसला दिया है। मंदिर में महिलाओं के प्रवेश को लेकर 800 साल से चली आ रही पुरानी परंपरा खत्म हो चुकी है।

सुप्रीम कोर्ट ने केरल के सबरीमाला मंदिर में हर उम्र की महिलाओं को प्रवेश करने और पूजा करने की इजाजत दे दी। पहले यहां 10 साल की बच्चियों से लेकर 50 साल तक की महिलाओं के प्रवेश पर पाबंदी थी। यह प्रथा 800 साल से चली आ रही थी। इस व्यवस्था को एक याचिका में चुनौती दी गई थी।

चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा ने शुक्रवार को इस याचिका पर फैसला सुनाया। अदालत ने कहा कि सभी अनुयायियों को पूजा करने का अधिकार है। लैंगिक आधार पर श्रद्धालुओं से भेदभाव नहीं किया जा सकता। फैसले में कहा गया है कि 10 साल की बच्चियों से लेकर 50 साल तक की महिलाओं को मंदिर में जाने से रोकने की प्रथा संवैधानिक सिद्धांतों का उल्लंघन है।

इसलिए चली आ रही थी यह परंपरा

केरल में शैव और वैष्णवों में बढ़ते वैमनस्य के कारण एक मध्य मार्ग की स्थापना की गई थी। इसके तहत अय्यप्पा स्वामी का सबरीमाला मंदिर बना। इसमें सभी पंथ के लोग आ सकते थे। ये मंदिर 800 साल पुराना माना जाता है। अयप्पा स्वामी को ब्रह्मचारी माना गया है। इसी वजह से मंदिर में उन महिलाओं का प्रवेश वर्जित था जो रजस्वला हो सकती थीं।

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EVENT

मेले में चेन चोरी तो लोगों ने 1.51 लाख रु.जुटाकर दिए, फिर बनी ‘मिसाल’

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खेजड़ली और बिश्नोई समाज एक बार फिर मिसाल बन गया है। प्रसिद्ध खेजड़जी मेले में घूमने आई महिला की सोने की चेन चोरी हो गई। मेले की साख के खातिर बिश्नाई समाज ने एकजुटता दिखाई।

यह घटना राजस्थान के प्रसिद्ध खेजड़ली मेले की है। जोधपुर के पास आयोजित इस पर्यावरण मेले में महिलाएं सोने के गहने पहनकर आती है। मेले का इतिहास रहा है कि यहां कभी किसी महिला के गहने चोरी नहीं हुए। इस कारण वे बेखौफ होकर यहां आती है। दैनिक भास्कर की एक खबर के मुताबिक, यहां घूमने आई पारसी देवी की 4 तोले सोने की चेन चोरी हो गई।

बात आयोजकों तक पहुंची। गांव के मेले की साख का सवाल था, तो वहां मौजूद हर शख्स ने थोड़ा-थोड़ा पैसा दिया। बिश्नोई समाज ने इंतजाम संभाला और हाथों-हाथ 1.51 लाख रुपए इकट्‌ठा हो गए। पैसा महिला को दिया गया, लेकिन महिला और उनके पति ने इसमें अपनी तरफ से 5 हजार रुपए जोड़कर पैसे वापस कर दिए। महिला ने इस पैसे से वहां सीसीटीवी कैमरे लगाने के लिए कहा, ताकि फिर यहां चोरी नहीं हो। मंदिर ट्रस्ट ने इसके लिए काम भी शुरू कर दिया है।

खेजड़ली मेला

खेजड़ली का ये मेला उन 363 लोगों की स्मृति में मनाया जाता है, जिन्होंने 1703 में पेड़ों की बचाने की जिद ठानकर जान दे दी थी। मेला हर साल मनाया जाता है। मेले के माहौल पर लोगों का ऐसा भरोसा है कि विश्नोई समाज की महिलाएं सिर से पैर तक गहनों से लदकर मेले में पहुंचती हैं। आज तक मेले से किसी की पिन तक चोरी नहीं हुई थी। ये पहला मौका था। उसमें भी सोने की चेन चोरी हो गई। यह हमारे लिए एक चेतावनी की तरह था। तभी फौरन कदम उठाया।

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