Connect with us

Jaipur Heritage

खूबसूरत नाहरगढ़ किले की रोचक कहानी

Published

on

राजस्थान की राजधानी जयपुर में उत्तर—पश्चिम में अरावली की पहाड़ी पर स्थित पीले रंग का नारहगढ़ किला गुलाबी नगर की खूबसूरती में चार चांद लगाता है। नाहरगढ़ का किला शहर के लगभग हर कोने से नजर आता
Nahargarh fort

Nahargarh fort

है। रात में यहां जब लाइटिंग होती है तो इसकी खूबसूरती और बढ़ जाती है। बारिश के दौरान यहां से जयपुर शहर का नजारा किसी हिल स्टेशन सरीखा होता है। खिड़कियों से बदलों की आवाजाही एक सुखद अहसास कराती है। यही वजह है कि जब शहर में बारिश होती है तो यहां लोग पिकनिक मनाने उमड़ पड़ते है। यह किला जितना खूबसूरत है उतना ही रहस्यमय। जानते है नाहरगढ़ किले का इतिहास और इससे जुड़े कुछ रोचक तथ्य—

नाहरगढ किले के नामकरण की कहानी

नाहरगढ़ किले का नाम पहले सुदर्शन किला रखा गया था। दरअसल द्वापर युग में भगवान श्रीकृष्ण ने देवराज इंद्र के पुत्र सुदर्शन का उद्धार किया था। ऋषि के श्राप की वजह से सुदर्शन अजगर बन गया था और वह इस क्षेत्र में रहता था। उस वक्त यह क्षेत्र अम्बिका वन के नाम से जाना जाता था। एक बार भगवान श्री कृष्ण यहां से गुजर रहे थे तो उनके साथ चल रहे नन्द बाबा को अजगर ने पकड़ लिया। श्रीकृष्ण ने अजगर से नन्द बाबा को छुड़वाकर श्राप से मुक्ति दिलाई। बाद में अम्बिका वन का नामकरण सुदर्शन खोल हो गया।
आमेर और जयपुर की दुश्मनों से सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए महाराजा सवाई जयसिंह द्वितीय ने 1734 में सुदर्शन खोल में एक पहाड़ी इस किले का निर्माण शुरू करवाया और इसका नाम सुदर्शन किला रखने का तय किया। कहा जाता है कि जहां यह किला बनवाया जा रहा था वहां नाहरसिंह नामक भोमियां जी का वास था। वह इस किले का बनने नहीं दे रहे थे। दिन में किले के लिए निर्माण होता और रात में वह धाराशाही हो जाता। तांत्रिक क्रियाएं कर नाहरसिंह भौमियां जी से यहां किले के निर्माण के लिए मनाया और उनका स्थान दूसरी जगह बनवाया गया। तब जाकर यहां किले का निर्माण हो सका। बाद में इस किले का नाम नाहरसिंह जी के नाम पर नाहरगढ़ रखा गया।

nahargarh fort 2

Nahargarh fort 

राजा ने रानियों के लिए बनवाए नौ महल

नाहरगढ़ किले का निर्माण सवाई जयसिंह द्वितीय के समय में शुरू हुआ और बाद के शासकों ने उसमें कई निर्माण कराएं। इतिहासकारों के अनुसार,सवाई रामसिंह ने यहां 1868 में तथ उसके बाद सवाई माधोसिंह ने 1883 से 1892 के बीच यहां लगभग साढ़े तीन लाख रूपए खर्च कर कई महत्वपूर्ण निर्माण कराए और नाहरगढ़ को वर्तमान रूप दिया। काफी लम्बे—चौड़े एरिया में फैले इस किले में की मुख्य इमारत को माघवेन्द्र महल के नाम से जाना जाता है। यहां पर इसके अतिरिक्त रानियों के लिए बनाए गए नौ और महल है। ये सभी महल माघवेन्द्र महल से परस्पर जुड़े हुए है। इन महलों के नाम नाम सूरज प्रकाश महल, चंद्र प्रकाश महल, आनन्द प्रकाश महल, जवाहर प्रकाश महल, लक्ष्मी प्रकाश महल, रत्न प्रकाश महल, ललित प्रकाश महल, बसंत प्रकाश महल और खुशाल प्रकाश महल है। माघवेन्द्र महल के सामने एक बावड़ी है। इसकी सीढ़ियां सामान्य नहीं है। तीन तरफ की सीढ़ियां लहरदार आकृति में बनी हुई है। इसकी इस खासियत के चलते यहां कई फिल्मों की शूटिंग हो चुकी है। किले के मुख्य दरवाजे के बाहर जाते समय बायें हाथ की तरफ प्राचीर के साथ ओपन थिएटर भी है। अपने समय का यह जयपुर का पहला मुक्ताकाशीय मंच था। यहां राजा महाराजाओं और ब्रिटिश परिवारों के लिए मनोरंजक कार्यक्रम आयोजित किए जाते थे। कारिन्दों और सैनिकों रहने के लिए भी यहां विशेष प्रबंध थे। यहां वर्षा जल संरक्षण के लिए टांके का निर्माण कराया गया।
वर्तमान में यहां नाइट ट्यूरिज्म को बढ़ावा देने के लिए यहां कैफेटेरिया, रेस्टोरेंट आदि की सुविधा है। जहां रात को देर तक पर्यटक बैठकर राजस्थानी भोजन का लुत्फ उठा सकते है। ओपन थियेटर में सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते है। पर्यटकों को यहां से रात में शहर का नजारा भी दिखाया जाता है।

तीन रास्ते हैं नाहरग18nahargarh-mainढ तक पहुंचने के

नाहरगढ किले तक पहुंचने के लिए तीन रास्ते है। पहला रास्ता पुरानी बस्ती होकर है। पुराने समय में जयपुर शहर से इस किले तक आने—जाने के लिए इस रास्ते का उपयोग काफी होता था, इसलिए यह नाहरगढ़ रोड के नाम से फेमस हो गया। इस रास्ते से पैदल या दुपहिया वाहन से पहुंचा जा सकता है लेकिन, पहाड़ी रास्ता घुमावदार और खराब होने के कारण जोखिम भरा रहता है। दूसरा रास्ता आमेर रोड पर कनक घाटी से है। वर्तमान में इस रास्ते का ही उपयोग आवाजाही के लिए होता है। छोटे—बड़े वाहनों की आवाजाही यहां से होती है। आमेर रोड से नाहरगढ किले की दूरी करीब नौ किलोमीटर है। घुमावदार रास्ता होने से यहां कई बार दुर्घटनाएं भी हो चुकी है इसलिए वाहन चलाते समय यहां सावधानी बरतना बहुत जरूरी है। यहां कई घुमाव बेहद खतरनाक है। जहां आए दिन दुर्घटनाएं होती रहती है। तीसरा रास्ता आमेर से है। लेकिन, इस रास्ते से पैदल ही आ—जा सकते है। पुराने समय में यहां आमेर के लोग इसी रास्ते से आते—जाते थे। यहां वाइल्ड लाइफ है इसलिए यह रास्ता काफी खतरनाक है। इसका उपयोग बहुत ही कम होता है। इस रास्ते का उपयोग क्षेत्र के जानकार के साथ ही करना ठीक है।

नाहरगढ़ से जुड़े रोचक तथ्य (Interesting facts related to Nahargarh)

  • नाहरगढ़ में अभी प्रेत्माओं का वास है। हालांकि यह अभी तक साबित नहीं हुआ लेकिन, कुछ लोग इसका दावा करते है।
  • जयपुर रियासत की प्रसिद्ध नृत्यांगना रसकपूर को यहां कैद किया गया था।
  • 1857 की क्रांति के समय जयपुर में रह रहे ब्रिटिश अधिकारियों और उनके परिवारों को महाराजा सवाई रामसिंह ने राजपरिवार ने सुरक्षित आश्रय देने के लिए नाहरगढ़ में रखा था।
  • पुराने समय में नाहरगढ़ से सुबह और शाम को तोप चलती थी। उसके आधार पर ही शहर मेंं प्रवेश के दरवाजे खोले एवं बन्द किए जाते थे।
  • वनक्षेत्र होने के कारण यहां बाघ विचरण करते थे। यह राजपरिवार की शिकारगाह भी थी। स्थानीय भाषा में बाघ और शेर को लोग नाहर कहते थे। इसलिए इसे नाहरगढ कहने लग गए। कुछ लोग इसे टाइगर फोर्ट भी कहते है।

Continue Reading
Comments

Jaipur Heritage

जयपुर के इस प्रसिद्ध मंदिर में भगवान कृष्ण ने की थी पूजा

Published

on

ambikehwar temple amer, jaipur

भगवान श्रीकृष्ण ने जयपुर में स्थित एक प्राचीन शिव मंदिर में पूजा की थी। यह मंदिर आमेर में है।

जयपुर के आमेर में स्थित अंबिकेश्वर महादेव मंदिर हजारों साल पुराना है। इस मंदिर की स्थापना द्वापर युग में हुई थी। भगवान श्रीकृष्ण ने इस मंदिर में पूजा भी की थी।

राजस्थान की राजधानी पिंकसिटी जयपुर में घूमने की कई प्रसिद्ध स्थान है। आमेर भी इनमें से एक है। आमेर जयपुर की प्राचीन राजधानी थी। आमेर में महल के अतिरिक्त और भी कई प्राचीन स्थान है। आमेर को आम्बेर भी कहा जाता है। इसका प्राचीन नाम अंबिका नगर था। यहां पर अंबिका वन था और उसके आधार पर इस क्षेत्र का नाम अंबिका नगर , फिर आम्बेर और अब आमेर हुआ।

आमेर घूमने आए तो यहां प्राचीन अंबिकेश्वर महादेव मंदिर के दर्शन करना ना भूले। यह मंदिर अपनी भव्यता के साथ ऐतिहासिकता के कारण फेमस है। प्राचीन अंबिकेश्वर शिव मंदिर आमेर फोर्ट के पास सागर रोड पर स्थित है।

स्थानीय निवासियों के अनुसार, द्वापर युग में भगवान श्रीकृष्ण ने अंबिकेश्वर महादेव मन्दिर में पूजा की थी। भगवान श्रीकृष्ण के अम्बिका वन में आने और यहां स्थित अंबिकेश्वर महादेव की पूजा करने का उल्लेख भगवत् पुराण में भी मिलता है। दरअसल, नंद बाबा और ग्वालों के संग श्रीकृष्ण इस वन में ही आए थे। उन्होंने यहां भगवान शिव की पूजा की थी।

यह प्रसिद्ध शिव मन्दिर 14 खंभों पर टिका हुआ है

शिव मंदिर की जहलरी भूतल से करीब 22 फुट गहरी है और इस मन्दिर की एक खासियत यह है कि बारिश के मौसम में यहां भूगर्भ का जल उपर तक आ जाता है और मूल शिवलिंग जलमग्न रहता है। बारिश का मौसम समाप्त होते ही यह पानी वापस भूगर्भ में चला जाता है जबकि उपर से डाला पानी भूगर्भ में नहीं जाता। जयपुर का यह प्रसिद्ध शिव मन्दिर 14 खंभों पर टिका हुआ है।

Continue Reading

Jaipur Heritage

20 साल बिना स्टैच्यू के रहा है जयपुर का स्टैच्यू सर्किल

Published

on

Pink City जयपुर के दर्शनीय स्थलों में Statue Circle प्रमुख है। स्टैच्यू सर्किल के पास ही राजस्थान का सचिवालय, विधानसभा और कई दूसरे सरकारी दफ्तर है। बिड़ला आॅडिटोरियम, बिड़ला तारामंडल भी यहीं पास में स्थित है।

स्टैच्यू सर्किल का नामकरण यहां स्थापित मूर्ति के कारण है। यहां पर जयपुर के संस्थापक सवाई जयसिंह द्धितीय की मूर्ति एक भव्य छतरी में लगी हुई है। यहां आसपास गार्डन और शाम को यहां अच्छी—खासी रौनक रहती है। जानकारी के अनुसार, यहां पर सवाई मानसिंह के समय भव्य गुंबद बनाकर उसमें सवाई मानसिंह की मूर्ति लगाने का निर्णय किया गया। दिसंबर 1942 में इसका निर्माण कार्य शुरू हो गया। यह स्थान शुरूआत में मान गुबंद के नाम से जनता के बीच फेसम रहा।

बात जब सवाई मानसिंह की मूर्ति लगाने की आई तो उस पर विवाद गहरा गया। राजपंडितों और विद्धानों ने सवाई मानसिंह ​को जीवित रहते खुद की मूर्ति नहीं लगाने की सलाह दी। उनका तर्क था कि मूर्ति मृत व्यक्ति की लगाई जाती है। इस विवाद के चलते यहां करीब 20 साल तक कोई मूर्ति नहीं लगी।

देश आजाद हो गया। उसके बाद तत्कालीन राजस्थान सरकार ने यहां जयपुर के संस्थापक सवार्इ जयसिंह की स्टेच्यू लगाने का निर्णय किया। वर्तमान में यहां लगी सवाई जयसिंह की मूर्ति का अनावरण 1963 में तत्कालीन राष्ट्रपति जाकिर हुसैन ने किया था। उसके बाद इसका नाम सवार्इ जयसिंह स्टेच्यू सर्किल हो गया। लोग संक्षिप्त में इसे स्टैच्यू सर्किल कहते है।

Continue Reading

Jaipur Heritage

PINK नहीं फिर भी Pink City कहलाता है Jaipur, जानिए वजह

Published

on

जयपुर दुनिया में Pink City  के नाम से फेमस है। जिन्होंने Jaipur का ट्यूर कभी नहीं किया, उनके जहन में पिंकसिटी को लेकर यह रहता है कि यह गुलाबी नगर होगा। देखा जाए तो इस शहर में कहीं पिंक कलर की प्रधानता नहीं है।

राजस्थान की राजधानी जयपुर की स्थापना 18 नवंबर 1727 ई. को सवाई जयसिंह के समय हुई थी। स्थापना के समय जयपुर में इमारतों और भवनों का रंग सफेद था। जयपुर के पिंकसिटी बनने की स्टोरी भी बड़ी रोचक है। इतिहासकारों के अनुसार, जयपुर को गुलाबी नगर यानि पिंक सिटी नाम एक अंग्रेज पत्रकार ने दिया। जयपुर को पिंक सिटी नाम देने वाले इस पत्रकार का नाम स्टेनली रीड है। यह पत्रकार 1905 में प्रिंस ऑफ वेल्स की जयपुर विजिट के दौरान उनके साथ आए थे।

दरअसल, सवाई रामसिंह द्वितीय ने वर्ष 1876 में जयपुर को एक जैसा दिखाने के लिए सभी इमारतों पर एक जैसा रंग करने का निर्णय किया। काफी विचार—विमर्श के बाद गेरू रंग से शहर की इमारतों पुतवाने का निर्णय हुआ। उस समय कानोता के पास ईंटों की भट्टी से गेरू रंग मंगवाया गया और जयपुर को उससे रंगा गया।

बाद में प्रिंस आॅफ वेल्स के साथ पत्रकार स्टेनली रीड जयपुर आए तो वे यहां खूबसूरती को देखकर अभिभूत हो गए। उन्होंने इस यात्रा वृतांत में जयपुर के गेरू रंग का उल्लेख किया, लेकिन गेरू रंग की सटीक अंग्रेजी उन्हें नहीं मिली तो पिंक शब्द का इस्तेमाल किया। कहा जाता है कि पहली बार उन्होंने इस शहर के लिए पिंक सिटी नाम का इस्तेमाल किया। बाद में यह नाम फेमस हो गया। आज विश्व में जयपुर की पिंकसिटी यानि गुलाबी नगर के नाम से पहचान बन चुकी है।

Continue Reading
Advertisement

Facebook

Trending