Connect with us

Jaipur Heritage

वाकई प्राचीन सभ्यताओं और कलाओं का संग्रह है अल्बर्ट हॉल

Published

on

जयपुर के रामनिवास बाग में स्थित अल्बर्ट हॉल संग्रहालय (albert hall museum) में भारत के विभिन्न राज्यों के साथ कई अन्य देशों की संस्कृति देखने को मिल जाएगी।  यहां आपकों राजपूत, मुगल, ब्रिटिश और इरानी स्थापत्य कला के दर्शन होंगे। गलियारों और बरामदों में रामायण कालीन भित्ती चित्र है तो अकबरकालीन रज्जनामा भी। यूरोप, मिश्र, चीन, ग्रीक, बेबिलोन सभ्यताओं की महत्वपूर्ण घटनाओं को भी यहां बेहद खूबसूरती के साथ दीवारों पर चित्रित किया गया है।

यहीं वजह है कि जयपुर घूमने आने वाले देसी—विदेशी सैलानी अल्बर्ट हॉल संग्रहालय को देखने के बाद ही अपनी जयपुर यात्रा पूरी मानते है। पर्यटन महत्व की यह इमारत राजनीति का भी केन्द्र रही है। इस इमारत के सामने खड़े होकर राष्ट्रीय स्तर के कई दिग्गज नेता जयपुर की जनता को संबोधित कर चुके है। इतना ही नहीं कई नामी कलाकार अपनी प्रतिभा का लोहा यहां मनवा चुके है।

-albert-hall

दिलचस्प है इसके निर्माण की कहानी

यह इमारत और यहां प्रदर्शित वस्तुएं जितनी रोचक है उतनी ही दिलचस्प है इसके निर्माण की कहानी। अलबर्ट हॉल संग्रहालय की नींव वर्ष 1876 में महाराजा रामसिंह द्वितीय के समय में प्रिंस आॅफ वेल्स अल्बर्ट एडवर्ड की जयपुर यात्रा के समय रखी गई थी। खास बात यह थी जब इस भवन के लिए नींव रखी जा रही थी तब यह तय नहीं था कि अल्बर्ट हॉल का उपयोग क्या किया जाएगा। तब नाम भी तय नहीं था। इसकी डिजाइन का जिम्मा उस समय सार्वजनिक निर्माण विभाग के निदेशक और मिलिट्री इंजीनियर सैम्युल स्विंटन जैकब को सौंपा गया। जैकब ने मुख्य ओवरसीयर तुजमल हुसैन, नक्शा नवीस शंकरलाल एवं छोटेलाल, कलाकार रामबख्श और प्रमुख कारीगर चन्दर और तारा तथा अन्य कारीगरों के सहयोग से यह निर्माण कराया। अल्बर्ट हॉल के भवन को बनने में करीब 10 साल लगे और इसे बनाने में कुल पांच लाख एक हजार छत्तीस रुपए खर्च हुए।

सवाई रामसिंह द्वितीय इसे टाउन हाल बनाना चाहते थे लेकिन उनके बाद जयपुर रिसायत की गदृी पर बैठे महाराजा सवाई माधोसिंह ने डॉ. थॉमस हॉलबियन हैंडले के सुझाव पर इसे कला संग्रहालय बनाने का निर्णय किया। जयपुर की यात्रा पर आए किंग एडवर्ड ब्रेडफोर्ड ने 6 फरवरी 1887 को इसका विधिवत उद्घाटन किया और इस भवन का नाम अल्बर्ट हॉल म्युजियम दिया गया।

धरोहर को 15  गैलरी में बांटा

अल्बर्ट हॉल संग्रहालय में प्रदर्शित धरोहर को 15 विषयों यानि गैलरी में बांटा गया हैं। मैटल आर्ट गैलरी में विभिन्न धातुओं से बनी कलाकृतियां जिनमें बर्तन, सुराही, दीपक, हुक्का, मूर्तियां, पूजा की थाली आदि प्रदर्शित है। आर्म्स गैलरी में प्राचीन अस्त्र—शस्त्र जिनमें तलवार, भाला, चाकू, गन पाउडर रखने का खास कंटेनर, बाघ का पंजा आदि प्रदर्शित है। स्कल्पचर गैलरी में चौथी, आठवीं, दसवीं सदी की विभिन्न देवी—देवताओं की मूर्तियां प्रदर्शित है। इसी तरह इंटरनेशनल आर्ट गैलरी में विभिन्न देशों की कलाकृतियां प्रदर्शित है। यहां पर ज्वैलरी, विभिन्न तरह के वाद्य यंत्र, कपड़े, कालीन, दरिया, लकड़ी की कलाकृतियां, मिस्त्र की ममी आदि दुर्लभ वस्तुओं का कलेक्शन देखने को मिलेगा।

Continue Reading
Comments

Jaipur Heritage

जयपुर के इस प्रसिद्ध मंदिर में भगवान कृष्ण ने की थी पूजा

Published

on

ambikehwar temple amer, jaipur

भगवान श्रीकृष्ण ने जयपुर में स्थित एक प्राचीन शिव मंदिर में पूजा की थी। यह मंदिर आमेर में है।

जयपुर के आमेर में स्थित अंबिकेश्वर महादेव मंदिर हजारों साल पुराना है। इस मंदिर की स्थापना द्वापर युग में हुई थी। भगवान श्रीकृष्ण ने इस मंदिर में पूजा भी की थी।

राजस्थान की राजधानी पिंकसिटी जयपुर में घूमने की कई प्रसिद्ध स्थान है। आमेर भी इनमें से एक है। आमेर जयपुर की प्राचीन राजधानी थी। आमेर में महल के अतिरिक्त और भी कई प्राचीन स्थान है। आमेर को आम्बेर भी कहा जाता है। इसका प्राचीन नाम अंबिका नगर था। यहां पर अंबिका वन था और उसके आधार पर इस क्षेत्र का नाम अंबिका नगर , फिर आम्बेर और अब आमेर हुआ।

आमेर घूमने आए तो यहां प्राचीन अंबिकेश्वर महादेव मंदिर के दर्शन करना ना भूले। यह मंदिर अपनी भव्यता के साथ ऐतिहासिकता के कारण फेमस है। प्राचीन अंबिकेश्वर शिव मंदिर आमेर फोर्ट के पास सागर रोड पर स्थित है।

स्थानीय निवासियों के अनुसार, द्वापर युग में भगवान श्रीकृष्ण ने अंबिकेश्वर महादेव मन्दिर में पूजा की थी। भगवान श्रीकृष्ण के अम्बिका वन में आने और यहां स्थित अंबिकेश्वर महादेव की पूजा करने का उल्लेख भगवत् पुराण में भी मिलता है। दरअसल, नंद बाबा और ग्वालों के संग श्रीकृष्ण इस वन में ही आए थे। उन्होंने यहां भगवान शिव की पूजा की थी।

यह प्रसिद्ध शिव मन्दिर 14 खंभों पर टिका हुआ है

शिव मंदिर की जहलरी भूतल से करीब 22 फुट गहरी है और इस मन्दिर की एक खासियत यह है कि बारिश के मौसम में यहां भूगर्भ का जल उपर तक आ जाता है और मूल शिवलिंग जलमग्न रहता है। बारिश का मौसम समाप्त होते ही यह पानी वापस भूगर्भ में चला जाता है जबकि उपर से डाला पानी भूगर्भ में नहीं जाता। जयपुर का यह प्रसिद्ध शिव मन्दिर 14 खंभों पर टिका हुआ है।

Continue Reading

Jaipur Heritage

20 साल बिना स्टैच्यू के रहा है जयपुर का स्टैच्यू सर्किल

Published

on

Pink City जयपुर के दर्शनीय स्थलों में Statue Circle प्रमुख है। स्टैच्यू सर्किल के पास ही राजस्थान का सचिवालय, विधानसभा और कई दूसरे सरकारी दफ्तर है। बिड़ला आॅडिटोरियम, बिड़ला तारामंडल भी यहीं पास में स्थित है।

स्टैच्यू सर्किल का नामकरण यहां स्थापित मूर्ति के कारण है। यहां पर जयपुर के संस्थापक सवाई जयसिंह द्धितीय की मूर्ति एक भव्य छतरी में लगी हुई है। यहां आसपास गार्डन और शाम को यहां अच्छी—खासी रौनक रहती है। जानकारी के अनुसार, यहां पर सवाई मानसिंह के समय भव्य गुंबद बनाकर उसमें सवाई मानसिंह की मूर्ति लगाने का निर्णय किया गया। दिसंबर 1942 में इसका निर्माण कार्य शुरू हो गया। यह स्थान शुरूआत में मान गुबंद के नाम से जनता के बीच फेसम रहा।

बात जब सवाई मानसिंह की मूर्ति लगाने की आई तो उस पर विवाद गहरा गया। राजपंडितों और विद्धानों ने सवाई मानसिंह ​को जीवित रहते खुद की मूर्ति नहीं लगाने की सलाह दी। उनका तर्क था कि मूर्ति मृत व्यक्ति की लगाई जाती है। इस विवाद के चलते यहां करीब 20 साल तक कोई मूर्ति नहीं लगी।

देश आजाद हो गया। उसके बाद तत्कालीन राजस्थान सरकार ने यहां जयपुर के संस्थापक सवार्इ जयसिंह की स्टेच्यू लगाने का निर्णय किया। वर्तमान में यहां लगी सवाई जयसिंह की मूर्ति का अनावरण 1963 में तत्कालीन राष्ट्रपति जाकिर हुसैन ने किया था। उसके बाद इसका नाम सवार्इ जयसिंह स्टेच्यू सर्किल हो गया। लोग संक्षिप्त में इसे स्टैच्यू सर्किल कहते है।

Continue Reading

Jaipur Heritage

PINK नहीं फिर भी Pink City कहलाता है Jaipur, जानिए वजह

Published

on

जयपुर दुनिया में Pink City  के नाम से फेमस है। जिन्होंने Jaipur का ट्यूर कभी नहीं किया, उनके जहन में पिंकसिटी को लेकर यह रहता है कि यह गुलाबी नगर होगा। देखा जाए तो इस शहर में कहीं पिंक कलर की प्रधानता नहीं है।

राजस्थान की राजधानी जयपुर की स्थापना 18 नवंबर 1727 ई. को सवाई जयसिंह के समय हुई थी। स्थापना के समय जयपुर में इमारतों और भवनों का रंग सफेद था। जयपुर के पिंकसिटी बनने की स्टोरी भी बड़ी रोचक है। इतिहासकारों के अनुसार, जयपुर को गुलाबी नगर यानि पिंक सिटी नाम एक अंग्रेज पत्रकार ने दिया। जयपुर को पिंक सिटी नाम देने वाले इस पत्रकार का नाम स्टेनली रीड है। यह पत्रकार 1905 में प्रिंस ऑफ वेल्स की जयपुर विजिट के दौरान उनके साथ आए थे।

दरअसल, सवाई रामसिंह द्वितीय ने वर्ष 1876 में जयपुर को एक जैसा दिखाने के लिए सभी इमारतों पर एक जैसा रंग करने का निर्णय किया। काफी विचार—विमर्श के बाद गेरू रंग से शहर की इमारतों पुतवाने का निर्णय हुआ। उस समय कानोता के पास ईंटों की भट्टी से गेरू रंग मंगवाया गया और जयपुर को उससे रंगा गया।

बाद में प्रिंस आॅफ वेल्स के साथ पत्रकार स्टेनली रीड जयपुर आए तो वे यहां खूबसूरती को देखकर अभिभूत हो गए। उन्होंने इस यात्रा वृतांत में जयपुर के गेरू रंग का उल्लेख किया, लेकिन गेरू रंग की सटीक अंग्रेजी उन्हें नहीं मिली तो पिंक शब्द का इस्तेमाल किया। कहा जाता है कि पहली बार उन्होंने इस शहर के लिए पिंक सिटी नाम का इस्तेमाल किया। बाद में यह नाम फेमस हो गया। आज विश्व में जयपुर की पिंकसिटी यानि गुलाबी नगर के नाम से पहचान बन चुकी है।

Continue Reading
Advertisement

Facebook

Trending